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ravinder batra


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क्रिकेटरों को न दें भारत रत्न

Posted On: 22 Dec, 2011  
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जनरल डब्बा में

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भ्रष्टाचार के अड्डे

Posted On: 6 Sep, 2011  
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जनरल डब्बा में

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सरकारों की सरेआम लूट

Posted On: 11 Aug, 2011  
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जनरल डब्बा में

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घोटालों का घाटा

Posted On: 3 Aug, 2011  
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जनरल डब्बा में

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इस पैसे से अस्पताल बनवाएं

Posted On: 21 Jul, 2011  
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जनरल डब्बा में

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चीनी में कड़वाहट न घोलें!

Posted On: 10 Jul, 2011  
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जनरल डब्बा में

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समाज में विकृति पैदा करता टी-वी

Posted On: 18 Jun, 2011  
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जनरल डब्बा में

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भक्ति या आडम्बर

Posted On: 16 Apr, 2011  
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जनरल डब्बा में

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शिक्षा का बाज़ार

Posted On: 22 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

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ओ पीपल के पेड़!!!

Posted On: 23 Jan, 2011  
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कविता में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

चलो भाई मै मन्दिरो का माल ले के, विदेशो मे मेहन्गे दाम पर बेच के अस्पताल बनवा देता हु । ईस माल मे भगवान की मुर्तिया भी है, उनके गेहने है, कपडे है । भगवान की मुर्ति का सौदा करना मुश्किल है । गेहने-कपडे बेचने मे भी गाली मिलेगी । अस्पताल का एक बडा हिस्सा अधुरा रह जायेगा । ईस माल मे पूरने सिक्के है वो आज कोई देश मे नही चलते । हा, थोडा सुनहरी मूल्य है, और ऐतिहासिक भी । लेकिन आर्कियोलोजी वाले कभी मुझे नही देने देन्गे । फीर क्या बचता है ? अस्पताल की निव भी नही हो सकती । सरकार अगर मदद कर दे तो काम हो सकता है । सरकार के हाथ मे लाठि है । जिसकी लाठि उस की भैस । मै पूरी भैस एक्सपोर्ट कर दुन्गा । अस्पताल बन जायेगा । लेकिन ये अस्पताल उन कोगो के लिये होगा जिनके बाप-दादा ने कभी दान दिया हो । हिन्दुओ ने ठेका नही लिया है दुसरे समाज की सेवा करने का । मन्दिर की चौखट देखी नही,चवन्नी का दान दिया नही चले आते है भीक मान्गने ।

के द्वारा: bharodiya

के द्वारा: Ritu Sharma

के द्वारा: nikhil

के द्वारा: आर.एन. शाही

रविन्द्र बत्रा जी, नारी सशक्तिकरण का सच शायद इससे स्पष्ट शब्दों में नहीं लिखा जा सकता| मजे की बात तो ये है कि नारियों के उत्थान की बात करने वाली तथाकथित आन्दोलनकारी स्त्रियों को स्वयं भी इस बात का अच्छी तरह से पता है एक और तो वे अपने शोषण और समाज की कुत्सित निगाहों की बात करती हैं और दूसरी तरफ स्वयं इस ओर मंत्रमुग्ध सी चली जाती हैं| वैसे तो पुरुषो पर दोहरी मानसिकता का आरोप लगाया जाता है लेकिन ये कथित प्रगतिगामी स्त्रियाँ जिस तरह विचारों और क्रिया कलापों में स्पष्ट रूप में दोहरा चरित्र धारण किये देखी जा रही हैं वह निश्चय ही हमारी सांस्कृतिक चरित्र हनन की एक बड़ी निशानी बन गया है| अच्छे वैचारिक लेख पर बधाई!

के द्वारा: chaatak




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